आरजु

दुआयें मांगी थी
मिन्नतें मांगी थी
भगवान के दर पे
सब बातें कही थी

फिर भी न कोई आवाज
ना कोई मदत मिली थी
पत्थर दिल है भगवान
सच्ची आरजू न सुनी थी

न सोना ना चांदी
ऐसी मिन्नतें नहीं थी
अपने बस मिल जाये
एक ख्वाहिश यही थी

फिर क्यों मिल गये
अधुरी जिनकी साथ थी
अपने न मिल पाए कही
दुआयें मेरी बेअसर थी

एक शिकायत तुझसे यही
मन से जो कही थी
तु तो ना बन पत्थर दिल
एक आरजु यह थी

-योगेश खजानदार

मंजिल

अकेला निकला हुं
में इस राह पर
मंजिल की मुझे
है तलाश

हजारों झुट मिले
हसते ही गले लगे
राह भटकने से
करे प्रयास

तुफान कुछ आयें
हौसलों से मिले
डरसे गये जब
दिखे विनाश

सच कुछ ऐसे मिला
कांटो में है घिरा
लेकर चले साथ की
करे प्रकाश

अकेले ही चला हु
राह से न भटका
मंजिल की मुझे अब
है तलाश

– योगेश खजानदार

-योगेश खजानदार

प्रेम किती मझ

मी भान हरपून
ऐकतच राही
तुझ्या शब्दातील
गोड भावना

हे रिक्त मन
पाहुन चौफेर
नजर शोधता
स्थिर राहीना

सुगंध दरवळत
जाईची फुले
ओढ तुझी मझ
का आवरेना

प्रेम किती मझ
चांदणे मोजता
हिशोब मझ तो
का लागेना

-योगेश खजानदार